सोशल मीडिया का शोर बनाम जनता का भरोसा
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से लेकर ‘वोट चोरी’ तक — मुद्दे बदलते रहे, निशाना एक ही रहा: मोदी सरकार और देश की संवैधानिक संस्थाएँ
-डॉ. नीरज पंत | पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, भारतीय जनता युवा मोर्चा, उत्तराखंड
भारतीय लोकतंत्र की ताक़त यह है कि यहाँ विरोध की आवाज़ को जगह मिलती है। लेकिन उसकी परिपक्वता इस बात से तय होती है कि विरोध मुद्दे के लिए है या मुद्दा विरोध के लिए। 2026 में सोशल मीडिया से उपजी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का सफ़र इसी सवाल का सबसे ताज़ा उदाहरण है — और उसके पीछे-पीछे चलती कांग्रेस की राजनीति इसका सबसे बड़ा जवाब।
एक टिप्पणी, एक इंस्टाग्राम पेज और करोड़ों ‘फ़ॉलोअर्स’
16 मई 2026 को एक ऑनलाइन पेज के रूप में CJP की शुरुआत हुई। इसके संस्थापक अभिजीत दिपके एक डिजिटल कम्युनिकेशन रणनीतिकार हैं, जो 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम में स्वयंसेवक रह चुके हैं। नाम ही भाजपा पर व्यंग्य था। कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर फ़ॉलोअर्स की संख्या करोड़ों में पहुँच गई। पर सोशल मीडिया पर ‘फ़ॉलो’ बटन दबाना और ज़मीन पर जनादेश जीतना — दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। यह पार्टी आज तक चुनाव आयोग में पंजीकृत तक नहीं है; यानी जनता की अदालत में जाने का कोई इरादा नहीं, सिर्फ़ ट्रेंड की अदालत में मुक़दमा।
जब बिना संगठन, बिना विचारधारा और बिना चुनावी जवाबदेही के कोई ‘पार्टी’ रातों-रात खड़ी होती है, तो स्वाभाविक सवाल उठता है — इस ऊर्जा की दिशा कौन तय कर रहा है? केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने बिना नाम लिए इसके पीछे ‘जॉर्ज सोरोस गैंग’ जैसी ताक़तों की ओर इशारा किया। ऐसे आरोपों की जाँच होनी चाहिए, पर इतना तो साफ़ दिखता है कि इस आंदोलन के सबसे उत्साही समर्थक वही चेहरे हैं जो हर चुनाव में मोदी से हारकर अब सड़क और स्क्रीन पर लड़ाई लड़ना चाहते हैं।
NEET: असली दर्द, सरकार का एक्शन और फिर बदलता एजेंडा
मई 2026 में NEET-UG का पेपर लीक हुआ और लगभग 20 लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। यह दर्द असली था और छात्रों का ग़ुस्सा जायज़। CJP ने इसी ग़ुस्से को अपना मंच बनाया। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार ने क्या किया — CBI ने पेपर लीक के आरोपियों को गिरफ़्तार किया, प्रधानमंत्री ने ख़ुद छात्रों से सीधा संवाद किया, और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पद से इस्तीफ़ा दिया। एक लोकतांत्रिक सरकार से जवाबदेही का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा?
असली परीक्षा इसके बाद थी। अगर आंदोलन सचमुच छात्रों के लिए था, तो माँग पूरी होने के बाद उसका फ़ोकस परीक्षा सुधार पर होना चाहिए था। पर अक्टूबर आते-आते वही मंच NEET छोड़कर मतदाता सूची के पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की माँग पर पहुँच गया — ठीक वही मुद्दा, जिस पर राहुल गांधी महीनों से ‘वोट चोरी’ का शोर मचा रहे हैं। छात्र की कॉपी से चुनाव आयोग की कुर्सी तक का यह सफ़र संयोग नहीं, एक राजनीतिक पटकथा जैसा दिखता है। युवाओं के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी राजनीति चलाने का इससे बेहतर उदाहरण मिलना मुश्किल है।
“छात्र की कॉपी से चुनाव आयोग की कुर्सी तक — मुद्दा बदला, पर निशाना वही रहा।”
कांग्रेस: पहले चुप्पी, फिर ‘हाई टी’
जून में जब छात्र सड़कों पर थे, तब कांग्रेस ने ‘सोची-समझी चुप्पी’ साध रखी थी — मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ पार्टी नेतृत्व यह देख रहा था कि आंदोलन किस ओर जाता है। जैसे ही आंदोलन चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ मुड़ा, कांग्रेस अचानक सक्रिय हो गई। अक्टूबर में राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा — “कोई समानांतर विरोध नहीं है, एक ही विरोध है।” रिपोर्टों के अनुसार कांग्रेस ने CJP नेताओं को राहुल गांधी की ‘हाई टी’ पर बुलाने के लिए संपर्क भी किया। संदेश साफ़ है: जिस आंदोलन से कांग्रेस को अपनी डूबती नैया को सहारा मिले, वही उसके लिए ‘जनता की आवाज़’ है।
संस्थाओं पर हमला: आरोप बड़े, सबूत ग़ायब
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने किसी संवैधानिक संस्था को कठघरे में खड़ा किया हो। अगस्त 2025 में उन्होंने कहा कि “चुनाव आयोग भाजपा के साथ मिलकर चुनाव चुरा रहा है।” चुनाव आयोग ने इन आरोपों को ‘बेतुका’ बताया और उन्हें दो विकल्प दिए — या तो अपने दावों पर शपथपूर्वक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करें, या देश से माफ़ी माँगें। आयोग ने यह भी कहा कि बार-बार बुलाने के बावजूद राहुल गांधी ने जवाब नहीं दिया। जो नेता अपने ही आरोपों पर शपथ लेने से कतराए, उसके ‘एटम बम’ और ‘हाइड्रोजन बम’ जैसे दावों को देश कितनी गंभीरता से ले?
राहुल गांधी का यह तरीक़ा पुराना है। 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ को सुप्रीम कोर्ट के नाम से जोड़ने पर उन्हें शीर्ष अदालत में बिना शर्त माफ़ी माँगनी पड़ी। चुनाव आयोग हो, जाँच एजेंसियाँ हों या न्यायपालिका — जब फ़ैसला उनके पक्ष में न आए, तो संस्था ही ‘बिकी हुई’ हो जाती है। यह लोकतंत्र की रक्षा नहीं, लोकतंत्र में जनता के भरोसे को खोखला करने की कोशिश है।
चयनात्मक ग़ुस्सा: झारखंड पर चुप क्यों?
अगर पेपर लीक सचमुच राष्ट्रीय चिंता है, तो क्या यह सिर्फ़ भाजपा-शासित राज्यों और केंद्र तक सीमित है? झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक को लेकर 2026 की गर्मियों में हफ़्तों तक छात्र आंदोलन चला। वहाँ JMM-कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। आंदोलनकारी छात्रों ने ख़ुद राहुल गांधी के आश्वासनों को ‘खोखला’ बताया और कहा कि इस नाकामी में कांग्रेस भी JMM जितनी ही ज़िम्मेदार है। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने ठीक ही पूछा — झारखंड और कर्नाटक में पेपर लीक पर राहुल गांधी कुछ क्यों नहीं बोलते? “ये छात्रों के कंधों पर राजनीति करना चाहते हैं।”
जहाँ कांग्रेस या उसके सहयोगी सत्ता में हैं, वहाँ न ‘मार्च’ होता है, न ‘ट्रेंड’, न इस्तीफ़े की माँग। यह दोहरा मापदंड ही बताता है कि लड़ाई छात्रों के भविष्य की नहीं, मोदी को सत्ता से हटाने की है।
भाषा की मर्यादा और राहुल गांधी
राजनीति में तीखी आलोचना जायज़ है, पर भाषा की एक मर्यादा होती है। फ़रवरी 2020 में दिल्ली की एक रैली में राहुल गांधी ने कहा कि छह महीने में “हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे” कि प्रधानमंत्री घर से नहीं निकल पाएँगे। देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए ऐसी भाषा? प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में इसका जवाब हिंसा से नहीं, संयम और हास्य से दिया — कि वे सूर्य नमस्कार बढ़ा देंगे ताकि पीठ हर डंडा झेल सके, और वे बीस साल से गालियाँ सुनकर ‘गाली-प्रूफ़’ हो चुके हैं। यही दोनों नेतृत्व का फ़र्क़ है।
2019 के ‘सारे चोरों का उपनाम मोदी क्यों’ वाले बयान पर सूरत की अदालत ने उन्हें मानहानि का दोषी ठहराया; सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सज़ा पर रोक लगाई, पर राहुल गांधी ने अदालत में साफ़ कहा कि वे माफ़ी नहीं माँगेंगे। और अब वे ‘जेन-ज़ी’ को ‘वोट चोरी रोकने’ के लिए आवाज़ दे रहे हैं — केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के शब्दों में यह उनकी ‘हताशा’ का प्रमाण है। जो नेता अपने देश के युवाओं को संस्थाओं के ख़िलाफ़ भड़काए, वह विपक्ष का नेता कम, अशांति का प्रचारक ज़्यादा लगता है।
“मोदी को गाली देना आसान है, मोदी जैसा भरोसा कमाना मुश्किल।”
दुनिया का भरोसा, देश का भरोसा
इस पूरे शोर के बीच एक तथ्य अडिग है — नरेंद्र मोदी पर देश और दुनिया का भरोसा। अमेरिकी संस्था मॉर्निंग कंसल्ट के मार्च 2026 के सर्वे में 68% अनुमोदन के साथ वे दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता रहे; अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के नेता उनसे बहुत पीछे थे। अगस्त 2026 में उज़्बेकिस्तान के सम्मान के साथ मोदी अब तक 25 देशों से उनका सर्वोच्च नागरिक सम्मान पा चुके हैं — किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए अभूतपूर्व।
एक मज़बूत, आत्मविश्वासी भारत हर किसी को सहज नहीं लगता। ऐसे में जब देश के भीतर कुछ ताक़तें सोशल मीडिया के ट्रेंड, अपुष्ट आरोपों और चयनात्मक आंदोलनों के सहारे एक निर्वाचित सरकार और संवैधानिक संस्थाओं की साख पर चोट करती हैं, तो जनता को सवाल पूछने का पूरा हक़ है — इससे फ़ायदा किसका होता है?
जनता सब समझती है
भारत की जनता ने बार-बार दिखाया है कि वह ट्रेंड से नहीं, काम से वोट देती है। NEET के दोषियों को जेल हुई, मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया — यह व्यवस्था की जवाबदेही है। लेकिन जो मंच छात्रों के आँसुओं से शुरू होकर चुनाव आयोग पर हमले तक पहुँच जाए, जो दल झारखंड पर चुप और दिल्ली पर मुखर रहे, और जो नेता अपने आरोपों पर शपथ लेने से भी बचे — उनकी मंशा अब किसी से छिपी नहीं। सोशल मीडिया का शोर कुछ दिन ‘ट्रेंड’ कर सकता है; देश का भविष्य उस भरोसे पर टिका है जो जनता ने बार-बार मतपेटी से दिया है।
नहीं, संयम और हास्य से दिया — कि वे सूर्य नमस्कार बढ़ा देंगे ताकि पीठ हर डंडा झेल सके, और वे बीस साल से गालियाँ सुनकर ‘गाली-प्रूफ़’ हो चुके हैं। यही दोनों नेतृत्व का फ़र्क़ है।
2019 के ‘सारे चोरों का उपनाम मोदी क्यों’ वाले बयान पर सूरत की अदालत ने उन्हें मानहानि का दोषी ठहराया; सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सज़ा पर रोक लगाई, पर राहुल गांधी ने अदालत में साफ़ कहा कि वे माफ़ी नहीं माँगेंगे। और अब वे ‘जेन-ज़ी’ को ‘वोट चोरी रोकने’ के लिए आवाज़ दे रहे हैं — केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के शब्दों में यह उनकी ‘हताशा’ का प्रमाण है। जो नेता अपने देश के युवाओं को संस्थाओं के ख़िलाफ़ भड़काए, वह विपक्ष का नेता कम, अशांति का प्रचारक ज़्यादा लगता है।
“मोदी को गाली देना आसान है, मोदी जैसा भरोसा कमाना मुश्किल।”
दुनिया का भरोसा, देश का भरोसा
इस पूरे शोर के बीच एक तथ्य अडिग है — नरेंद्र मोदी पर देश और दुनिया का भरोसा। अमेरिकी संस्था मॉर्निंग कंसल्ट के मार्च 2026 के सर्वे में 68% अनुमोदन के साथ वे दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता रहे; अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के नेता उनसे बहुत पीछे थे। अगस्त 2026 में उज़्बेकिस्तान के सम्मान के साथ मोदी अब तक 25 देशों से उनका सर्वोच्च नागरिक सम्मान पा चुके हैं — किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए अभूतपूर्व।
एक मज़बूत, आत्मविश्वासी भारत हर किसी को सहज नहीं लगता। ऐसे में जब देश के भीतर कुछ ताक़तें सोशल मीडिया के ट्रेंड, अपुष्ट आरोपों और चयनात्मक आंदोलनों के सहारे एक निर्वाचित सरकार और संवैधानिक संस्थाओं की साख पर चोट करती हैं, तो जनता को सवाल पूछने का पूरा हक़ है — इससे फ़ायदा किसका होता है?
जनता सब समझती है
भारत की जनता ने बार-बार दिखाया है कि वह ट्रेंड से नहीं, काम से वोट देती है। NEET के दोषियों को जेल हुई, मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया — यह व्यवस्था की जवाबदेही है। लेकिन जो मंच छात्रों के आँसुओं से शुरू होकर चुनाव आयोग पर हमले तक पहुँच जाए, जो दल झारखंड पर चुप और दिल्ली पर मुखर रहे, और जो नेता अपने आरोपों पर शपथ लेने से भी बचे — उनकी मंशा अब किसी से छिपी नहीं। सोशल मीडिया का शोर कुछ दिन ‘ट्रेंड’ कर सकता है; देश का भविष्य उस भरोसे पर टिका है जो जनता ने बार-बार मतपेटी से दिया है।


